महातीर्थ स्थल जहां से मिलता है मोक्ष।

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जहां लोग परिक्रमा, पूजा-पाठ, स्नान, मुंडन आदि कार्यों के लिए जाते हैं, हम सभी जानते हैं कि उस पवित्र स्थल को तीर्थ स्थल कहते हैं। तीन शब्द के स्थल के अनेकानेक अर्थ निकलते हैं, उदाहरण स्वरूप- सड़क, मार्ग, रास्ता, घाट, स्रोत, जलाशय, साधना अथवा मंत्रणा आदि। तीर्थ से तात्पर्य पुण्य कार्य के लिए अर्पित स्थान विशेष से भी है, जो प्रायः किसी पवित्र नदी या सरोवर के किनारे बना हो। उपचार, तरकीब, पुण्यात्मा, योग्य व्यक्ति तथा श्रद्धा का पात्र- ये सब पद भी तीर्थ के अर्थ के रूप में प्रयुक्त होते हैं। मुक्ति प्रदान करने वाले या रक्षक को भी तीर्थ कहा जाता है। लेकिन तीर्थ का जो सबसे उपयुक्त अर्थ प्रतीत होता है, वह है तारने वाला या मोक्ष प्रदान करने वाला। इसीलिए तीर्थ स्थलों की कल्पना मोक्ष प्रदान करने वाले स्थलों के रूप में की गई है। ऐसा स्थान, जहां जीवन-मृत्यु के चक्र से आत्मा मुक्त हो जाती है। मोक्ष की इच्छा है तो तीर्थ स्थानों की यात्रा कीजिए। मोक्ष और तीर्थ दोनों शब्द एक-दूसरे के पर्याय जैसे रहे हैं, लेकिन क्या मात्र एक स्थान विशेष या जड़ पदार्थ मोक्ष में सहायक हो सकता है? वस्तुतः वे सभी संज्ञा शब्द चाहे वे व्यक्ति हों, स्थान हो अथवा भाव हो, या जो भी मनुष्य की श्रद्धा के केंद्र हैं, तीर्थ ही हैं। धर्मोपदेशक अथवा अध्यात्म भी तीर्थ है। उपदेश, शिक्षा और यज्ञ भी तीर्थ ही है। योग्य व्यक्तियों द्वारा किया गया पवित्र कार्य भी तीर्थ है, और जहां यह कार्य संपन्न किया जाए, वह स्थल भी तीर्थ ही कहलाने लगता है। स्थान विशेष तीर्थ का प्रतीक बन जाता है। जब स्थान विशेष ही तीर्थ की पहचान बन जाता है, तो तीर्थ का मूल तत्व भुला दिया जाता है। जब मंदिर-मस्जिद, नदी या सरोवर का घाट या पर्वत श्रृंग तीर्थ हैं, तो तीर्थ यात्री और उसकी श्रद्धा भी तीर्थ है। जब तीर्थ यात्री ही नहीं होगा तो तीर्थ ही कहां से होगा। और अगर तीर्थ यात्री में श्रद्धा ही नहीं होगी तो भी तीर्थ का क्या प्रयोजन? शिक्षक भी तीर्थ है और शिक्षणालय भी तीर्थ है। यहां तीनों की प्रकृति भिन्न है, लेकिन तीनों का उद्देश्य एक ही है और वह है ज्ञान द्वारा स्वयं को जानना। आत्मज्ञान में सहायक होने वाले तत्व ही सच्चे तीर्थ हैं, उनका स्वरूप चाहे जैसा भी हो। जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकर हुए हैं। तीर्थंकर का अर्थ है पथ-प्रदर्शक अथवा मुक्ति का मार्ग दिखाने वाला। अतः सभी तीर्थंकर तीर्थ ही हुए। भगवान आदित्यनाथ या ऋषभदेव भी एक तीर्थ हैं, भगवान बाहुबली और भगवान महावीर भी तीर्थ हैं। उनकी स्मृति में स्थापित मंदिर या शिवालय भी तीर्थ है, उनकी वाणी भी तीर्थ है। मंत्र भी एक तीर्थ है और मंत्रोच्चारण से उत्पन्न भाव सृष्टि भी एक तीर्थ यात्रा है। माता-पिता और गुरु भी तीर्थ है।

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